Tuesday, April 19, 2011
अलसाया मन
Sunday, April 17, 2011
तन्हा जिंदगी
अगर ना जीया तन्हा,
तो वो ज़िन्दगी क्या है |
उन उलझे से ख्यालों में
झांक के तो देखो तो सही ,
जानोगे की,
उन ख्यालों का वादा क्या है |
ज़िन्दगी का इरादा क्यों पूछते हो,
ये तो बताओ
आपका इरादा क्या है |
Sunday, April 10, 2011
चलो फिर से मुस्कुराएं
कॉमन रूम की उस चार-दीवारी में
कितने दिन गुज़रे, कितनी रातें गुजरीं
अब याद नहीं |
देखा था वहां हर रात का सवेरा
बन जो गया था वह हमारा बसेरा ,
संग हमने कई किस्से बुने
वे किस्से कब अफसाने बन गए ,
अब याद नहीं |
फर्श की धूल को खुद में समेट
मेहनत से सींच,
देते थे उसे आकार अनेक |
दौड़ता था नसों में वही धूल
लहू बनकर ,
जोश चढ़ता था परवान
जूनून बनकर ,
वो धूल से सने कपडे कब बदले ,
अब याद नहीं |
भूखे-प्यासे रहते थे मगन
जाने कैसी थी वो अगन ,
गाते थे हम सब एक ही गीत
बढ़ता था जोश, जूनून और प्रीत
सोचते थे लेंगे दुनिया जीत,
इन तानो बानो के बीच
ना जाने कितने ही नए रिश्ते बने,
वो रिश्ते कब छूट गए
वे यारानें कब टूट गए
अब याद नहीं |
आज दूर क्षितिज पे जब देखता हूँ,
तो लगता है की
हर नदी का एक किनारा होता है,
और डूबता है सूरज कहीं, तो कहीं सवेरा भी तो होता है |
आज,
चलो फिर से मुस्कुराएं
जो सो गयी हैं रातें
उन्हें फिर से जगाएं,
बिसरे हुए लम्हों को
फिर से याद में लायें ,
चलो फिर दिल से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं|