कॉमन रूम की उस चार-दीवारी में
कितने दिन गुज़रे, कितनी रातें गुजरीं
अब याद नहीं |
देखा था वहां हर रात का सवेरा
बन जो गया था वह हमारा बसेरा ,
संग हमने कई किस्से बुने
वे किस्से कब अफसाने बन गए ,
अब याद नहीं |
फर्श की धूल को खुद में समेट
मेहनत से सींच,
देते थे उसे आकार अनेक |
दौड़ता था नसों में वही धूल
लहू बनकर ,
जोश चढ़ता था परवान
जूनून बनकर ,
वो धूल से सने कपडे कब बदले ,
अब याद नहीं |
भूखे-प्यासे रहते थे मगन
जाने कैसी थी वो अगन ,
गाते थे हम सब एक ही गीत
बढ़ता था जोश, जूनून और प्रीत
सोचते थे लेंगे दुनिया जीत,
इन तानो बानो के बीच
ना जाने कितने ही नए रिश्ते बने,
वो रिश्ते कब छूट गए
वे यारानें कब टूट गए
अब याद नहीं |
आज दूर क्षितिज पे जब देखता हूँ,
तो लगता है की
हर नदी का एक किनारा होता है,
और डूबता है सूरज कहीं, तो कहीं सवेरा भी तो होता है |
आज,
चलो फिर से मुस्कुराएं
जो सो गयी हैं रातें
उन्हें फिर से जगाएं,
बिसरे हुए लम्हों को
फिर से याद में लायें ,
चलो फिर दिल से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं|
3 comments:
Hats Off!! honest and original :)
Great tht you could get your thoughts on paper, actually involving too, I could actually remember my HTDS gov telling me to clear the dust on the floor with our clothes......nice effort this i'd say
pissu da jab bhi aapki alumni meet hogi aur apne doston ko bulaoge to ye jaroor bhejna....poora batch aa jayega!!!
very nice....
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