पहले तो कभी ना मिलना हुआ,
पर जब मिले तो लगा
की फिर से मुलाकात हुई,
बातों ही बातों में कुछ अनकही बात हुई |
उसका मुस्कुराना और आँखों से
बहुत कुछ कह जाना,
उसका नज़रें झुकाना और
उन्हें उठा के क़यामत ढाना,
उसकी बातों का मेरे मन में एक धुन छेड़ जाना
और मेरा उस धुन को अक्सर,
गुनगुना के मुस्कुराना |
उसकी प्यार भरी बातों पर
मुझे प्यार आना
मुझे इन सबकी आदत सी
हो गयी थी,
और इस आदत से
एक चाहत सी हो गयी थी |
पर अब सब बेगाना सा लगता है
अपना भी अंजाना सा लगता है
बीता हुआ हर लम्हा,
अब अफसाना लगता है |
कल मैंने उन आफसानो को
कैनवास पर उतारने की कोशिश की
पर अफ़सोस,
अब वे रंग ही नहीं पकड़ते |
Tuesday, January 10, 2012
Tuesday, November 1, 2011
प्रकृति आज क्यूँ निस्तभ्द है
प्रकृति आज क्यूँ निस्तभ्द है
सभी प्राणियों से विछ्छुब्द
किस विनाश के भंवर घिरी यह ,
मनुज आज क्यूँ इस पर क्रुद्ध है |
थी गुंजित कल तक खग - कलरव से
आज पड़ी सूनी होकर है |
गात जल रही धू -धू करके ,
मनुज हस रहा सब खोकर है |
सूख रहे देखो नद- नाले ,
जलधि कूल वीरान पड़ा है |
इन्द्रदेव भी कुपित दिख रहे ,
जलता जग बस मौन खड़ा है |
वीरानी छाई धरती पर ,
तरुओं का कूल नष्ट हो रहा ,
सुखी आँखें वसुंधरा की ,
मनुज आज पथभ्रष्ट हो रहा |
चकाचौंध जग भौतिकता में ,
दूषित वातावरण कर रहा ,
स्वच्छ वायु के लिए तड़पकर ,
अपना जीवन हरण कर रहा |
ठूंठ पड़े धरती के उपवन
सूनी पड़ी धरा की गोद |
त्राहि -त्राहि की गूँज मची है ,
अँधा मानव करता मोद |
नोट : यह कविता मैंने अपने स्कूल मैगजीन के लिए छठे वर्ग में लिखी थी |
सभी प्राणियों से विछ्छुब्द
किस विनाश के भंवर घिरी यह ,
मनुज आज क्यूँ इस पर क्रुद्ध है |
थी गुंजित कल तक खग - कलरव से
आज पड़ी सूनी होकर है |
गात जल रही धू -धू करके ,
मनुज हस रहा सब खोकर है |
सूख रहे देखो नद- नाले ,
जलधि कूल वीरान पड़ा है |
इन्द्रदेव भी कुपित दिख रहे ,
जलता जग बस मौन खड़ा है |
वीरानी छाई धरती पर ,
तरुओं का कूल नष्ट हो रहा ,
सुखी आँखें वसुंधरा की ,
मनुज आज पथभ्रष्ट हो रहा |
चकाचौंध जग भौतिकता में ,
दूषित वातावरण कर रहा ,
स्वच्छ वायु के लिए तड़पकर ,
अपना जीवन हरण कर रहा |
ठूंठ पड़े धरती के उपवन
सूनी पड़ी धरा की गोद |
त्राहि -त्राहि की गूँज मची है ,
अँधा मानव करता मोद |
नोट : यह कविता मैंने अपने स्कूल मैगजीन के लिए छठे वर्ग में लिखी थी |
Thursday, May 12, 2011
कभी कभी कुछ लिख लेता हूँ
1.
एक बार अदब के साथ
निकलो तो सही ,
कारवां तो खुद-ब-खुद जुड़ जायेगा |
एक इरादे के साथ कदम तो जरा बढ़ा,
ये जमीं आसमा बन जाएगा ,
ख्वाबों के पतंग उड़ना छोड़,
तभी तू खुद भी उड़ पायेगा |
कारवां तो खुद-ब-खुद जुड़ जायेगा |
एक इरादे के साथ कदम तो जरा बढ़ा,
ये जमीं आसमा बन जाएगा ,
ख्वाबों के पतंग उड़ना छोड़,
तभी तू खुद भी उड़ पायेगा |
2.
आज की बारिश ने अरमानो का दरिया बना दिया,
उस दरिया में मैं एक कागज़ की कस्ती तैरा दिया,
उसपे मैंने अपना नाम लिखा था |
उस दरिया में मैं एक कागज़ की कस्ती तैरा दिया,
उसपे मैंने अपना नाम लिखा था |
3.
दुनिया की नज़रों में जो चाहत ढूंढते हो,
थोड़ी खुद से भी कर लो तुम,
मत बैठो यूं दीन,
थोडा यकीन खुद पे भी कर लो तुम |
Saturday, May 7, 2011
प्यार के किस्से
हर किसी के प्यार के किस्से ,
कम से कम दो-चार होते हैं |
किस्से तो हमारे भी हैं,
हम भी किसी के लबों के
जिक्र-ए-आम रहे,
पर अफ़सोस ,
की हम कहानी के नायक नहीं ,
बल्कि,
बस एक किरदार रहे |
उसके नैनों के तरकश से
तीर निकले किसी और के लिए ,
पर चौराहे पर खड़े ,
हम क़त्ल-ए-आम हुए |
हर वक़्त मिलना होता ,
पर दोस्तों का भी साथ होता ,
ऐसी महफिलों में
मैं सबसे दूर बैठता ,
क्यूंकि वहां से,
उसे एकटक ताकना आसान होता |
बेतरतीब पड़े हम बिस्तर पे
करवटें बदलते रहे ,
हर करवट के साथ
वह और भी निखर जाती थी ,
और इधर हमारी दुनिया,
थोड़ी सी और बिखर जाती थी |
आज सोचता हूँ की ,
काश मै अपने प्यार को थोड़े लब्ज दे पाता ,
या फिर अपने नैनों की भाषा ही समझा पाता ,
तो फिर आज वेदना नहीं,
बल्कि प्रेम रस के गीत गाता |
Friday, May 6, 2011
कल रात मैं सो न सका
कल रात मैं सो न सका
सुबह होने के इंतज़ार में
रात भर जागता रहा |
अगले दिन
तारे छिप गए ,
पर सूरज ना निकला |
घुप्प अँधेरा ,
अँधेरा ऐसा की ,
साया भी साथ छोड़ गया |
डर के मारे,
मेरी चीख निकल गयी ,
कुछ देर इंतज़ार किया,
फिर सन्नाटे का जवाब आया |
मै फिर से चीखना चाहा
पर आवाज़ सांस में ही अटक गयी,
कुछ देर रुक ,
मैंने सोचने की कोशिश की ,
उस सोच में मैंने
अपनी आवाज़ को खोजने की कोशिश की,
पर वह सोच मस्तिस्क में ही कही भटक गयी |
आज मेरे कमरे की दीवारें भी
मेरे सवालों का जवाब नहीं देती ,
अब तो बस मेरी चुप्पी से ही
मेरी बातें होती है,
आज मेरे लब भी
एक मुस्कुराहट को ,
आइने के मोहताज़ हैं |
और अब उस शीशे की मुस्कुराहट भी ,
लबों को चुभने लगी है |
Tuesday, April 19, 2011
अलसाया मन
अलसाया सा मन,
भूल गया है की
जीवन है, एक रण |
खवाबों में अपने
जीवन का यथार्थ ढूंढता है मन ,
हकीकत से डरकर,
कल्पनाओं में अपने
है शूरमा, ये मन |
एक फूल के जैसे
भंवरे की इंतज़ार में
कुनमुना कर
सो जाता है,
राह में गिरे फूलों
में खो जाता है |
उस फूल की खुशबू
जानने को ,
आज बेताब है मन |
Sunday, April 17, 2011
तन्हा जिंदगी
जिंदगी में एक लम्हा
अगर ना जीया तन्हा,
तो वो ज़िन्दगी क्या है |
उन उलझे से ख्यालों में
झांक के तो देखो तो सही ,
जानोगे की,
उन ख्यालों का वादा क्या है |
ज़िन्दगी का इरादा क्यों पूछते हो,
ये तो बताओ
आपका इरादा क्या है |
अगर ना जीया तन्हा,
तो वो ज़िन्दगी क्या है |
उन उलझे से ख्यालों में
झांक के तो देखो तो सही ,
जानोगे की,
उन ख्यालों का वादा क्या है |
ज़िन्दगी का इरादा क्यों पूछते हो,
ये तो बताओ
आपका इरादा क्या है |
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