Tuesday, November 1, 2011

प्रकृति आज क्यूँ निस्तभ्द है

प्रकृति आज क्यूँ निस्तभ्द है
सभी प्राणियों से विछ्छुब्द
किस विनाश के भंवर घिरी यह ,
मनुज आज क्यूँ इस पर क्रुद्ध है |

थी गुंजित कल तक खग - कलरव से
आज पड़ी सूनी होकर है |
गात जल रही धू -धू करके ,
मनुज हस रहा सब खोकर है |

सूख रहे देखो नद- नाले ,
जलधि कूल वीरान पड़ा है |
इन्द्रदेव भी कुपित दिख रहे ,
जलता जग बस मौन खड़ा है |

वीरानी छाई धरती पर ,
तरुओं का कूल नष्ट हो रहा ,
सुखी आँखें वसुंधरा की ,
मनुज आज पथभ्रष्ट हो रहा |

चकाचौंध जग भौतिकता में ,
दूषित वातावरण कर रहा ,
स्वच्छ वायु के लिए तड़पकर ,
अपना जीवन हरण कर रहा |

ठूंठ पड़े धरती के उपवन
सूनी पड़ी धरा की गोद |
त्राहि -त्राहि की गूँज मची है ,
अँधा मानव करता मोद |

नोट : यह कविता मैंने अपने स्कूल मैगजीन के लिए छठे वर्ग में लिखी थी |

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