Friday, May 6, 2011

कल रात मैं सो न सका

कल रात मैं सो न सका
सुबह होने के इंतज़ार में
रात भर जागता रहा |
अगले दिन
तारे छिप गए ,
पर सूरज ना निकला |
घुप्प अँधेरा ,
अँधेरा ऐसा की ,
साया भी साथ छोड़ गया |
डर के मारे,
मेरी चीख निकल गयी ,
कुछ देर इंतज़ार किया,
फिर सन्नाटे का जवाब आया |
मै फिर से चीखना चाहा
पर आवाज़ सांस में ही अटक गयी,
कुछ देर रुक ,
मैंने सोचने की कोशिश की ,
उस सोच में मैंने
अपनी आवाज़ को खोजने की कोशिश की,
पर वह सोच मस्तिस्क में ही कही भटक गयी |
आज मेरे कमरे की दीवारें भी
मेरे सवालों का जवाब नहीं देती ,
अब तो बस मेरी चुप्पी से ही
मेरी बातें होती है,
आज मेरे लब भी
एक मुस्कुराहट को ,
आइने के मोहताज़ हैं |
और अब उस शीशे की मुस्कुराहट भी ,
लबों को चुभने लगी है |

3 comments:

Anonymous said...

why so serious?? :(

abhishek Ranjan said...

jabar likhe ho.. tumhari kavita ko dekh kar ab tumhara naam rakhne ka man ho raha hai.....

"Piyush Akela" :P

Prabhat said...

mast poem, with mast expressions.. expressing the scenario vividly...machau hai