Tuesday, January 10, 2012
आदत
पर जब मिले तो लगा
की फिर से मुलाकात हुई,
बातों ही बातों में कुछ अनकही बात हुई |
उसका मुस्कुराना और आँखों से
बहुत कुछ कह जाना,
उसका नज़रें झुकाना और
उन्हें उठा के क़यामत ढाना,
उसकी बातों का मेरे मन में एक धुन छेड़ जाना
और मेरा उस धुन को अक्सर,
गुनगुना के मुस्कुराना |
उसकी प्यार भरी बातों पर
मुझे प्यार आना
मुझे इन सबकी आदत सी
हो गयी थी,
और इस आदत से
एक चाहत सी हो गयी थी |
पर अब सब बेगाना सा लगता है
अपना भी अंजाना सा लगता है
बीता हुआ हर लम्हा,
अब अफसाना लगता है |
कल मैंने उन आफसानो को
कैनवास पर उतारने की कोशिश की
पर अफ़सोस,
अब वे रंग ही नहीं पकड़ते |
Tuesday, November 1, 2011
प्रकृति आज क्यूँ निस्तभ्द है
सभी प्राणियों से विछ्छुब्द
किस विनाश के भंवर घिरी यह ,
मनुज आज क्यूँ इस पर क्रुद्ध है |
थी गुंजित कल तक खग - कलरव से
आज पड़ी सूनी होकर है |
गात जल रही धू -धू करके ,
मनुज हस रहा सब खोकर है |
सूख रहे देखो नद- नाले ,
जलधि कूल वीरान पड़ा है |
इन्द्रदेव भी कुपित दिख रहे ,
जलता जग बस मौन खड़ा है |
वीरानी छाई धरती पर ,
तरुओं का कूल नष्ट हो रहा ,
सुखी आँखें वसुंधरा की ,
मनुज आज पथभ्रष्ट हो रहा |
चकाचौंध जग भौतिकता में ,
दूषित वातावरण कर रहा ,
स्वच्छ वायु के लिए तड़पकर ,
अपना जीवन हरण कर रहा |
ठूंठ पड़े धरती के उपवन
सूनी पड़ी धरा की गोद |
त्राहि -त्राहि की गूँज मची है ,
अँधा मानव करता मोद |
नोट : यह कविता मैंने अपने स्कूल मैगजीन के लिए छठे वर्ग में लिखी थी |
Thursday, May 12, 2011
कभी कभी कुछ लिख लेता हूँ
कारवां तो खुद-ब-खुद जुड़ जायेगा |
एक इरादे के साथ कदम तो जरा बढ़ा,
ये जमीं आसमा बन जाएगा ,
ख्वाबों के पतंग उड़ना छोड़,
तभी तू खुद भी उड़ पायेगा |
उस दरिया में मैं एक कागज़ की कस्ती तैरा दिया,
उसपे मैंने अपना नाम लिखा था |
Saturday, May 7, 2011
प्यार के किस्से
Friday, May 6, 2011
कल रात मैं सो न सका
Tuesday, April 19, 2011
अलसाया मन
Sunday, April 17, 2011
तन्हा जिंदगी
अगर ना जीया तन्हा,
तो वो ज़िन्दगी क्या है |
उन उलझे से ख्यालों में
झांक के तो देखो तो सही ,
जानोगे की,
उन ख्यालों का वादा क्या है |
ज़िन्दगी का इरादा क्यों पूछते हो,
ये तो बताओ
आपका इरादा क्या है |
Sunday, April 10, 2011
चलो फिर से मुस्कुराएं
कॉमन रूम की उस चार-दीवारी में
कितने दिन गुज़रे, कितनी रातें गुजरीं
अब याद नहीं |
देखा था वहां हर रात का सवेरा
बन जो गया था वह हमारा बसेरा ,
संग हमने कई किस्से बुने
वे किस्से कब अफसाने बन गए ,
अब याद नहीं |
फर्श की धूल को खुद में समेट
मेहनत से सींच,
देते थे उसे आकार अनेक |
दौड़ता था नसों में वही धूल
लहू बनकर ,
जोश चढ़ता था परवान
जूनून बनकर ,
वो धूल से सने कपडे कब बदले ,
अब याद नहीं |
भूखे-प्यासे रहते थे मगन
जाने कैसी थी वो अगन ,
गाते थे हम सब एक ही गीत
बढ़ता था जोश, जूनून और प्रीत
सोचते थे लेंगे दुनिया जीत,
इन तानो बानो के बीच
ना जाने कितने ही नए रिश्ते बने,
वो रिश्ते कब छूट गए
वे यारानें कब टूट गए
अब याद नहीं |
आज दूर क्षितिज पे जब देखता हूँ,
तो लगता है की
हर नदी का एक किनारा होता है,
और डूबता है सूरज कहीं, तो कहीं सवेरा भी तो होता है |
आज,
चलो फिर से मुस्कुराएं
जो सो गयी हैं रातें
उन्हें फिर से जगाएं,
बिसरे हुए लम्हों को
फिर से याद में लायें ,
चलो फिर दिल से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं|
Tuesday, January 25, 2011
गणतंत्र दिवस
बंद कमरों में बैठे लोग गणतंत्र दिवस फेसबुक पे मना रहे हैं | और मै उनसे कोई अलग नहीं हूँ क्यूंकि मेरे पास भी और कोई चारा नहीं है, सारा चारा लालू जी ने वर्षों पहले चबा जो लिया था |
वैसे मै जब भी गणतंत्र दिवस के बारे में सोचता हु तो मुझे मेरा बचपन याद आता है| मेरा बचपन एक छोटे से शहर में बीता है और हमारा स्कूल भी वैसा ही था , छोटा | पर उस स्कूल के यादें आज तक ताजा हैं |छबीस जनवरी के दिन सुबह सुबह पौ फटने से पहले ही हम बच्चे प्रभात फेरी पे निकलते थे| जिन्हें प्रभात फेरी न पता हो उन्हें बता दूँ की यह एक जूलूस जैसा होता है जो पुरे शहर का चक्कर काटता है और इसका अंतिम पड़ाव वह जगह होती है जहाँ हमारे राष्ट्रीय झंडे को फहराया जाता है|हमलोग पिछले दिन ही अपने अपने झंडे खरीद लाया करते थे और सुबह सुबह चार बजे नहा के तैयार बैठे रहते थे की कब प्रभात फेरी आएगी | और फिर जब उसमे शामिल हो जाते थे तब अपनी सबसे ऊँची आवाज में नारे लगाते हुए स्कुल तक जाते थे| कुछ नारे आज तक मेरे जुबान पे हैं -- "लाल बाल पाल की "- जय ; "जब तक सूरज चाँद रहेगा , गाँधी तेरा नाम रहेगा" इत्यादि| स्कूल तक पहुँचते पहुँचते गला फट चूका होता था फिर भी जोश में कोई कमी नहीं आती थी | जितना जोश उन दिनों होता था वह आज कही खो गया है , ये सब अब व्यर्थ लगता है | लोग अपने घरो में बैठ के छुट्टियाँ मानते हैं ,कहीं कहीं लोग एक बड़ा सा साउंडबौक्स लगा देते हैं और दिन भर उनपे कानों को फाड़ देने वाले स्वर में देशभक्ति के गाने चलाते हैं | पर , चलो इसी बहाने थोडा देशभक्ति का आलम तो बन जाता है ,एक बार लोग देश नाम की चीज को याद तो कर लेते हैं |
गणतंत्र दिवस के कई मायने हैं , सभी लोगो के लिए अलग अलग |यहाँ हमारे कॉलेज में लोग इसे एक दिन पीस मारने के हिसाब से देखते हैं, सरकारी नौकर इसे एक छुट्टी का दिन मनाते है अपने परिवार के साथ कही पिकनिक मनाते हैं ,और प्रशासन हर साल जनता को गणतंत्र दिवस पर सुनहरे सपने दिखाता है । नए गणतंत्र दिवस पर पुरानी घोषणाओं को भूलकर कर दी जाती है एक नई घोषणा। और ये सारी घोषणाएं अगले गणतंत्र दिवस तक घोषणा ही बनी रहती है|
पर सवाल तो यह है की अगर हम गणतंत्र दिवस याद भी कर लें ,एक दिन के लिए देशभक्ति के स्वर में बोल भी ले तो भी क्या फायदा ? हम एक दिन में अपने देश को बना या बिगाड़ तो नहीं देंगे | बात तो तब होगी जब इस देश का हर नागरिक देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियां जाने ,समझे और उसपे अमल करे| मै मानता हूँ की यह सब कह देना, लिख देना बहुत ही आसान है | पर मेरी यही इच्छा है की कम से कम मेरे ये दो शब्द उस बड़े से साउंडबौक्स की तरह की किसी की कानो में गूँज पैदा करे और कुम्भकर्णी नींद में सोये हुए लोगो को जगाये |
देखा आपने, बात बात में ही कहा पहुँच गया मै !! आज जब कोई प्रभात फेरी नहीं है चिल्लाने को तो मै सोचा की एक ब्लॉग ही लिख डालूं और यह ब्लॉग तो भावनाओं का सरोवर बन गया !!...हह!!
खैर जो भी हो , कम से कम आज भी एक बात तो नहीं बदली ;बचपन में मै दादाजी की जलेबियों का इन्तेजार करता था और आज के डेट में मेस के लड्डू का !!
अंतिम में जय हिंद लिखने की बहुत ही तीव्र इच्छा हो रही है,.....खैर!!