Tuesday, November 1, 2011
प्रकृति आज क्यूँ निस्तभ्द है
सभी प्राणियों से विछ्छुब्द
किस विनाश के भंवर घिरी यह ,
मनुज आज क्यूँ इस पर क्रुद्ध है |
थी गुंजित कल तक खग - कलरव से
आज पड़ी सूनी होकर है |
गात जल रही धू -धू करके ,
मनुज हस रहा सब खोकर है |
सूख रहे देखो नद- नाले ,
जलधि कूल वीरान पड़ा है |
इन्द्रदेव भी कुपित दिख रहे ,
जलता जग बस मौन खड़ा है |
वीरानी छाई धरती पर ,
तरुओं का कूल नष्ट हो रहा ,
सुखी आँखें वसुंधरा की ,
मनुज आज पथभ्रष्ट हो रहा |
चकाचौंध जग भौतिकता में ,
दूषित वातावरण कर रहा ,
स्वच्छ वायु के लिए तड़पकर ,
अपना जीवन हरण कर रहा |
ठूंठ पड़े धरती के उपवन
सूनी पड़ी धरा की गोद |
त्राहि -त्राहि की गूँज मची है ,
अँधा मानव करता मोद |
नोट : यह कविता मैंने अपने स्कूल मैगजीन के लिए छठे वर्ग में लिखी थी |
Thursday, May 12, 2011
कभी कभी कुछ लिख लेता हूँ
कारवां तो खुद-ब-खुद जुड़ जायेगा |
एक इरादे के साथ कदम तो जरा बढ़ा,
ये जमीं आसमा बन जाएगा ,
ख्वाबों के पतंग उड़ना छोड़,
तभी तू खुद भी उड़ पायेगा |
उस दरिया में मैं एक कागज़ की कस्ती तैरा दिया,
उसपे मैंने अपना नाम लिखा था |
Saturday, May 7, 2011
प्यार के किस्से
Friday, May 6, 2011
कल रात मैं सो न सका
Tuesday, April 19, 2011
अलसाया मन
Sunday, April 17, 2011
तन्हा जिंदगी
अगर ना जीया तन्हा,
तो वो ज़िन्दगी क्या है |
उन उलझे से ख्यालों में
झांक के तो देखो तो सही ,
जानोगे की,
उन ख्यालों का वादा क्या है |
ज़िन्दगी का इरादा क्यों पूछते हो,
ये तो बताओ
आपका इरादा क्या है |
Sunday, April 10, 2011
चलो फिर से मुस्कुराएं
कॉमन रूम की उस चार-दीवारी में
कितने दिन गुज़रे, कितनी रातें गुजरीं
अब याद नहीं |
देखा था वहां हर रात का सवेरा
बन जो गया था वह हमारा बसेरा ,
संग हमने कई किस्से बुने
वे किस्से कब अफसाने बन गए ,
अब याद नहीं |
फर्श की धूल को खुद में समेट
मेहनत से सींच,
देते थे उसे आकार अनेक |
दौड़ता था नसों में वही धूल
लहू बनकर ,
जोश चढ़ता था परवान
जूनून बनकर ,
वो धूल से सने कपडे कब बदले ,
अब याद नहीं |
भूखे-प्यासे रहते थे मगन
जाने कैसी थी वो अगन ,
गाते थे हम सब एक ही गीत
बढ़ता था जोश, जूनून और प्रीत
सोचते थे लेंगे दुनिया जीत,
इन तानो बानो के बीच
ना जाने कितने ही नए रिश्ते बने,
वो रिश्ते कब छूट गए
वे यारानें कब टूट गए
अब याद नहीं |
आज दूर क्षितिज पे जब देखता हूँ,
तो लगता है की
हर नदी का एक किनारा होता है,
और डूबता है सूरज कहीं, तो कहीं सवेरा भी तो होता है |
आज,
चलो फिर से मुस्कुराएं
जो सो गयी हैं रातें
उन्हें फिर से जगाएं,
बिसरे हुए लम्हों को
फिर से याद में लायें ,
चलो फिर दिल से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं|